शनिवार, 29 नवंबर 2014

प्रजा विचित्र तुम्हारी है—नागार्जुन

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       मुहम्मद इलियास हुसैन

सच न बोलना—नागार्जुन

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा
, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना
, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

जन-गण-मन अधिनायक जय हो
, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!

बंद सेल
, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में
, यमराज तुम्हारी मदद करे। 

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का
, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला
, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है
, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई
, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है
, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ
, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे
, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो
, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा
,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

माताओं पर
, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे
, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है
, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है
, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है! 

रोज़ी-रोटी
, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो
, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना
, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी
, जाएगा वह जहां कहीं!

सपने में भी सच न बोलना
, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया
, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का
,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा
, चरण गहो श्रीमानों का!
—‘हज़ार-हज़ार बाहों वाली से

1 टिप्पणी:

  1. जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
    भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!—इन पंक्तियों के कवि हैं—
    (A) केदारनाथ अग्रवाल (B) नागार्जुन (C) केदारनाथ सिंह (D) धूमिल

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