शुक्रवार, 6 मार्च 2015

मुक्तिबोध की दो कविताएँ- अँधेरे में और ब्रह्मराक्षस https://www.google.co.in/


ब्रह्मराक्षसऔर अंधेरे मेंवे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे टिण्टर्न ऐबीऔर इम्मॉर्टलिटी ओडको पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल रागऔर वनवेलाको पढ़ कर निराला को पहचाना जा सकता हैवैसे ही इन दो कविताओं को पढ़ कर मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व को समझा जा सकता है .

 

 अँधेरे में

 
ज़िन्दगी के

कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;

आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखतानहीं ही दीखता
,
किन्तु वह रहा घूम

तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से
,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा

अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,

और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती हैवह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत

खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह
ख़ुद-ब-ख़ुद

कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि

मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और

भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु

कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?

बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब
अँधेरा सब ओर
,
निस्तब्ध जल
,
पर, भीतर से उभरती है सहसा

सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुसकाता है,
पहचान बताता है
,
किन्तु, मैं हतप्रभ
,
नहीं वह समझ में आता।

अरे ! अरे !!
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक
वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर

चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात्
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक

तिलस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड़ से
……………………
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी
अन्तराल-विवर के तम में
लाल-लाल कुहरा,
कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक
,
रहस्य साक्षात् !!

तेजो प्रभामय उसका ललाट देख
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख
सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्

गहन एक संदेह।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव
,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह
,
आत्मा की प्रतिमा।

प्रश्न थे गम्भीर, शायद ख़तरनाक भी,
इसी लिए बाहर के गुंजान

जंगलों से आती हुई हवा ने
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी-
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर
मौत की सज़ा दी !

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही
आँखों में बँध गयी,
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया
,
किसी शून्य बिन्दु के अँधियारे खड्डे में

गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !

 
 

ब्रह्मराक्षस

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अंधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों

उस पुराने घिरे पानी में
समझ में आ न सकता हो

कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।

बावड़ी को घेर
डालें खूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औदुम्बर।

व शाखों पर
लटकते घुग्घुओं के घोंसले परित्यक्त भूरे गोल।
विद्युत शत पुण्यों का आभास
जंगली हरी कच्ची गंध में बसकर
हवा में तैर
बनता है गहन संदेह
अनजानी किसी बीती हुई उस श्रेष्ठता का जो कि
दिल में एक खटके सी लगी रहती।

बावड़ी की इन मुंडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक
बैठी है टगर
ले पुष्प तारे-श्वेत

उसके पास
लाल फूलों का लहकता झौंर
मेरी वह कन्हेर

वह बुलाती एक खतरे की तरफ जिस ओर

अंधियारा खुला मुँह बावड़ी का
शून्य अम्बर ताकता है।

बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है,
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज
,
हड़बड़ाहट शब्द पागल से।

गहन अनुमानिता
तन की मलिनता
दूर करने के लिए प्रतिपल
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात
स्वच्छ करने
ब्रह्मराक्षस

घिस रहा है देह
हाथ के पंजे बराबर,
बाँह-छाती-मुँह छपाछप

खूब करते साफ़,
फिर भी मैल

फिर भी मैल!!

औरहोठों से
अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,
अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार
,
मस्तक की लकीरें

बुन रहीं
आलोचनाओं के चमकते तार!!
उस अखण्ड स्नान का पागल प्रवाह….
प्राण में संवेदना है स्याह!!

किन्तु, गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु, जब
तल तक पहुँचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने
झुककर नमस्ते कर दिया।

पथ भूलकर जब चांदनी
की किरन टकराये
कहीं दीवार पर,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है

वन्दना की चांदनी ने
ज्ञान गुरू माना उसे।

अति प्रफुल्लित कण्टकित तन-मन वही
करता रहा अनुभव कि नभ ने भी
विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!

और तब दुगुने भयानक ओज से
पहचान वाला मन
सुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं से
मधुर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र छन्दस्, मन्त्र, थियोरम,
सब प्रेमियों तक

कि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बी
कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भी
सभी के सिद्ध-अंतों का
नया व्याख्यान करता वह
नहाता ब्रह्मराक्षस, श्याम
प्राक्तन बावड़ी की
उन घनी गहराईयों में शून्य।

……ये गरजती, गूँजती, आन्दोलिता
गहराइयों से उठ रही ध्वनियाँ, अतः
उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में
हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता,
वह रूप अपने बिम्ब से भी जूझ

विकृताकार-कृति
है बन रहा
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ

बावड़ी की इन मुंडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैं
टगर के पुष्प-तारे श्वेत

वे ध्वनियाँ!

सुनते हैं करोंदों के सुकोमल फूल
सुनता है उन्हे प्राचीन ओदुम्बर
सुन रहा हूँ मैं वही
पागल प्रतीकों में कही जाती हुई
वह ट्रेजिडी
जो बावड़ी में अड़ गयी।

x x x

खूब ऊँचा एक जीना साँवला

उसकी अंधेरी सीढ़ियाँ

वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।
एक चढ़ना औउतरना,
पुनः चढ़ना औलुढ़कना
,
मोच पैरों में

व छाती पर अनेकों घाव।
बुरे-अच्छे-बीच का संघर्ष

वे भी उग्रतर

अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर
गहन किंचित सफलता,
अति भव्य असफलता

अतिरेकवादी पूर्णता

की व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं

ज्यामितिक संगति-गणित
की दृष्टि के कृत

भव्य नैतिक मान

आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान
अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना

कब रहा आसान

मानवी अंतर्कथाएँ बहुत प्यारी हैं!!

रवि निकलता
लाल चिन्ता की रुधिर-सरिता
प्रवाहित कर दीवारों पर,
उदित होता चन्द्र

व्रण पर बांध देता
श्वेत-धौली पट्टियाँ
उद्विग्न भालों पर
सितारे आसमानी छोर पर फैले हुए
अनगिन दशमलव से
दशमलव-बिन्दुओं के सर्वतः
पसरे हुए उलझे गणित मैदान में
मारा गया, वह काम आया,
और वह पसरा पड़ा है

वक्ष-बाँहें खुली फैलीं

एक शोधक की।

व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद-सा,
प्रासाद में जीना

व जीने की अकेली सीढ़ियाँ
चढ़ना बहुत मुश्किल रहा।
वे भाव-संगत तर्क-संगत
कार्य सामंजस्य-योजित
समीकरणों के गणित की सीढ़ियाँ
हम छोड़ दें उसके लिए।
उस भाव तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन-
शोध में
सब पण्डितों, सब चिन्तकों के पास
वह गुरू प्राप्त करने के लिए
भटका!!

किन्तु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी
लाभकारी कार्य में से धन,
व धन में से हृदय-मन
,
और, धन-अभिभूत अन्तःकरण में से

सत्य की झाईं

निरन्तर चिलचिलाती थी।

आत्मचेतस् किन्तु इस
व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन
विश्वचेतस् बे-बनाव!!

महत्ता के चरण में था
विषादाकुल मन!
मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि
तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर
बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य
उसकी महत्ता!
व उस महत्ता का
हम सरीखों के लिए उपयोग,
उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व!!

पिस गया वह भीतरी
बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!

बावड़ी में वह स्वयं
पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
मर गया
वह सघन झाड़ी के कँटीले

तम-विवर में
मरे पक्षी-सा
विदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गयी
यह क्यों हुआ!
क्यों यह हुआ!!
मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य
होना चाहता
जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,
उसकी वेदना का स्रोत

संगत पूर्ण निष्कर्षों तलक
पहुँचा सकूँ।

 
मुक्तिबोध की दो कविताएँ- अँधेरे में और ब्रह्मराक्षस

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