रविवार, 25 मई 2014

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865-1947) की रचनाएं/Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh' ki Rachnayen


अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865-1947)  की रचनाएं/Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh' ki Rachnayen

(15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947, निजामाबाद, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश)

 

प्रियप्रवास हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार (1938) प्राप्त हो चुका है। इस प्रकार खड़ी बोली का प्रथम महाकवि होने का श्रेय 'हरिऔध' जी को है।

 


1899  ई. 'रसिक रहस्य'

1900 ई. 'प्रेमाम्बुवारिधि', 'प्रेम प्रपंच'

1901 ई. 'प्रमाम्बु प्रश्रवण', 'प्रेमाम्बु प्रवाह'

1904 ई. 'प्रेम पुष्पहार'

1906 ई. 'उदबोधन'

1909 ई. 'काव्योपवन'

1916 ई. 'कर्मवीर'

1917 ई. 'ऋतु मुकुर'

1925 ई. 'पद्मप्रसून'

1927 ई. 'पद्मप्रमोद'

1932 ई. 'चोखेचौपदे'

 'चुभते चौपदे'

 रसकलश




 मर्मस्पर्श

 पवित्र पर्व

 दिव्य दोहावली

 हरिऔध सतसई



उपन्यास : 'प्रेमकान्ता' (1894), ठेठ हिन्दी का ठाठ या देवबाला (1899), अधखिला फूल (1907)


संपादन : कबीर वचनावली (1917)

ललित निबंध : संदर्भ सर्वस्व


आत्मकथात्मक गद्य  : इतिवृत्त

पुरस्कार/सम्मान

1922  हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति (1922)

1934  हिंदी साहित्य सम्मेलन के चौबीसवें अधिवेशन (दिल्ली, 1934) के सभापति

1937  12 सितंबर 1937 ई. को नागरी प्रचारिणी सभा, आरा की ओर से राजेंद्र 1937  प्रसाद   द्वारा अभिनंदन ग्रंथ भेंट (12 सितंबर 1937)

1938  'प्रियप्रवास' पर मंगला प्रसाद पुरस्कार


प्रियप्रवास में पुत्र-वियोग में व्यथित यशोदा का करुण चित्र देखिए

प्रिय प्रति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?
दुःख जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आजलौं जी सकी हूँ।
वह ह्रदय हमारा नैन तारा कहाँ है?

हरिऔध जी ने कृष्ण को ईश्वर रूप में न दिखा कर आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने स्वयं कृष्ण के मुख से कहलवाया है
विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का,
सहाय होना असहाय जीव का।
उबारना संकट से स्वजाति का,
मनुष्य का सर्व प्रधान धर्म है।

राधा का अपने प्रियतम कृष्ण के वियोग का दुख सह कर भी लोक-हित की कामना करती हैं
प्यारे जीवें जग-हित करें, गेह चाहे न आवें।

कृष्ण के वियोग में ब्रज के वृक्ष भी रोते हैं
फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूँदें लखातीं,
रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।

संध्या का एक सुंदर दृश्य देखिए
दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी जब राजती,
कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।

राधा का रूप-वर्णन करते समय उनकी भाषा देखिए
रूपोद्याम प्रफुल्ल प्रायः कलिका राकेंदु-बिंबानना,
तन्वंगी कल-हासिनी सुरसि का क्रीड़ा-कला पुत्तली।
शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी लावण्य लीलामयी,
श्री राधा-मृदु भाषिणा मृगदगी-माधुर्य की मूर्ति थी।

चौपदों की भाषा इसी प्रकार की है
नहीं मिलते आँखों वाले, पड़ा अंधेरे से है पाला।
कलेजा किसने कब थामा, देख छिलते दिल का छाला।।

कहें क्या बात आंखों की, चाल चलती हैं मनमानी
सदा पानी में डूबी रह, नहीं रह सकती हैं पानी
लगन है रोग या जलन, किसी को कब यह बतलाया
जल भरा रहता है उनमें, पर उन्हें प्यासी ही पाया


श्री सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के शब्दों में हरिऔध जी का महत्व और अधिक स्पष्ट हो जाता है-
'इनकी यह एक सबसे बड़ी विशेषता है कि ये हिंदी के सार्वभौम कवि हैं। खड़ी बोली, उर्दू के मुहावरे, ब्रजभाषा, कठिन-सरल सब प्रकार की कविता की रचना कर सकते हैं।

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