बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

बालकृष्ण शर्मा नवीन का रचनाएँ (कालक्रमानुसार)


बालकृष्ण शर्मा नवीन का रचनाएँ (कालक्रमानुसार)

(जन्म : 8 दिसंबर 1897-29 अप्रैल 1960 ई., ग्वालियर राज्य के भवाना ग्राम में)

राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि, प्रेम और मस्तीपरक काव्य के अग्रदूत, हालावाद के आदि प्रवर्तक।
इनकी प्रथम कहानी ‘संतू’ (1918 ई.) सरस्वती में प्रकाशित हुई।
सात काव्य-संग्रह :
कुंकुम (1936 ई.), अपलक (1951 ई.), रश्मिरेखा (1952 ई.), क्वासी (1952 ई.), विनोबा स्तवन (1955 ई.), उर्मिला (1957 ई., खंडकाव्य, यह छः सर्गों में विभक्त, उर्मिला के जन्म से लेकर लक्ष्मण से पुनर्मिलन तक की कथा वर्णित, लक्ष्मण-पत्नी उर्मिला का उज्ज्वल चरित्र-चित्रण),  प्रार्णव (गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान पर लिखित अप्रकाशित खंडकाव्य), हम विषपायी जनम के (1964 ई.)।
सं. : प्रताप (1931 ई.), प्रभा (1921-1923 ई.)
काव्य-पंक्तियां :
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए।
एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से आए। (विप्लव गान, हम विषपायी जनम के)
आज खडेग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ
विजय पताका झुकी हुई है, लक्ष्य भ्रष्ट यह तीर हुआ। (कुंकुम)
है बलिवेदी, सखे, प्रज्वलित मांग रही ईंधन क्षण-क्षण,
आओ युवक, तुम लगा दो अपने यौवन का ईंधन,
भस्मसात हो जाने दो ये प्रबल उमंगें जीवन की,
अरे सुलगने दो बलिवेदी, चढ़ने दो बलि यौवन की। (हम विषपायी जनम के)
स्वार्गादपि गरीयसी प्यारी, जन्मभूमि का पल्ला
खींचा है दुष्टों ने, बोला है स्वदेश पर हल्ला
कौन हृदय है जो कि न उबले निज समाज की क्षति में ?
कौन आँख है देख सके जो माँ को इस दुर्गति में ? (उर्मिला)
पर चलने के पूर्व यहाँ से कर ले तू वंदन अभिराम
इस सरयू सरिता का, जिस बालू में खेले राम। (उर्मिला)
मैं ही भारत के भविष्य का मूर्तिमन्त विश्वास महान।

हम विषपायी जनम के सहे सुबोल कुबोल।

कोटि-कोटि कंठों से निकली आज यही स्वर धारा है
भारतवर्ष हमारा यह, हिंदुस्तान हमारा है।

मैं देवदूत, मैं अग्निदूत, मैं मनःपूत चिर बलिदानी।

जगजीवन का उन्नायक मैं, अंगारों की मेरी वाणी।

साहित्यिक-सामाजिक सेवाओं के लिए 1960 ई. में पद्मभूषण की उपाधि प्रदान की गई।
और अधिक जानकारी के लिए विजिट करें :
://hindisahityavimarsh.com/



गुरुवार, 30 जनवरी 2020

भाषा और साहित्य प्रश्नोत्तरी (आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर विशेष)-1

प्रश्नोत्तरी-12 (भाषा और साहित्य, आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर विशेष)

1. #“शुक्लजी स्वच्छंद चिंतक थे। उन्होंने भारतीय परंपरा को मानते हुए  भी अंधानुकरण कहीं नहीं किया है। आधुनिक पश्चिमी शास्त्रमीमांसा को विदेशी कहकर त्यागा भी नहीं है। यथास्थान उसका संग्रह भी (किया) है।” 
उपर्युक्त कथन किसका है?
(1) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (2) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (3) आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (4) रामविलास शर्मा
2. #‘चिंतामणि’ किसका निबंध संग्रह है?
(1) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (2) हजारीप्रसाद द्विवेदी (3) रामविलास शर्मा (4) आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
3. 'साहित्य क्या है' शीर्षक निबंध के रचनाकार हैं:
(1) बालकृष्ण भट्ट (2) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (3) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (4) विवेकीराय
4. 'कविता क्या है?' निबंध के रचनाकार हैं :
(1) बद्रीनाथ भट्ट (2) अनूप शर्मा (3) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (4) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
5. अंग्रेजी के निबंधकार जोसेफ एडिसन के निबंध 'प्लेजर्स आफ इमेजीनेशन' का 'कल्पना का आनंद' शीर्षक से स्वच्छंद भाषांतर किसने किया था?
(1) राहुल सांकृत्यायन (2) बालकृष्ण भट्ट (3) बालमुकुन्द (4) रामचंद्र शुक्ल
6. 'रसात्मकता बोध के विविध रूप' शीर्षक निबंध के रचनाकार हैं :
(1) बालमुकुन्द (2) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (3) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (4) रामविलास शर्मा
7. साहित्य को 'कल्पना और विचार की भाषा' किसने कहा है :
(1) बालकृष्ण भट्ट (2) गुलाबराय (3) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (4) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
8. ''साहित्य के अंतर्गत वह सारा वाङ्मय लिया जा सकता है जिसमें अर्थबोध के अतिरिक्त भावोन्मेष या चमत्कारपूर्ण अनुरंजन हो तथा जिसमें ऐसे वाङ्मय की विचारात्मक व्याख्या हो ।''
उपर्युक्त कथन किसका है?
(1) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (2) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (3) निराला (4) रामविलास शर्मा
9. ''जो उक्ति हृदय में कोई भाव जाग्रत कर दे या उसे प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की मार्मिक व्यंजना में लीन कर दे वह तो है काव्य। ''
उपर्युक्त कथन किसका है?
(1) बालमुकुन्द गुप्त (2) बालकृष्ण भट्ट (3) चंद्रधरशशर्मा गुलेरी (4) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
10. '' वाणी का वह चमत्कारपूर्ण विन्यास जो हमारे मन में भावनाओं को तरंगायित कर देता है, काव्य है। ''
उपर्युक्त कथन किस साहित्येतिहासकार का है?
(1) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (2) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (3) रामकुमार वर्मा (4) रामविलास शर्मा

उत्तर तथा और अधिक जानकारी के लिए विजिट करें :

://www.hindisahityavimarsh.com


रविवार, 26 जनवरी 2020

अध्यापक सरदारपूर्ण सिंह के निबंध/essays of Adhyapak Sardar Purnasingh

अध्यापक सरदारपूर्ण सिंह के निबंध/essays of Adhyapak Sardar Purnasingh

#सरदार पूर्ण सिंह ने हिंदी में बहुत कम लिखा है। उनके अब तक कुल 6 निबंध प्राप्त हुए हैं। सच्ची वीरता (1909 ई.), कन्यादान (1909 ई.), पवित्रता (1910 ई.), आचरण की सभ्यता (1912 ई.), मज़दूरी और प्रेम (1912 ई.) तथा अमेरिका का मस्त योगी वाल्टह्वीटमैन (1983 ई.)। सातवां निबंध ‘धन की परिभाषा’ अप्राप् है। माधवसिंह भंडारी ‘पार्वती’ के अनुसार इसका प्रकाशन लाहौर की किसी अव्यवसायिक पत्रिका में हुआ था। (अध्यापक पूर्णसिंह निबंधावली, सं. रामअवध शास्त्री, ऋषि पब्लिकेशन, नई दिल्ली, संस्करण 1999 से साभार)

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

#शिवदान सिंह चौहान की #रचनाएं/The Works of Shivdaan Singh Chauhan

#शिवदान सिंह चौहान की #रचनाएं/The Works of Shivdaan Singh Chauhan 

(15 मई 1918 ई. - अगस्त 2000 ई.), बमानी, सेमरा, आगरा (उत्तर प्रदेश)
(1) रक्त रंजित स्पेन (स्पेन के गृहयुद्ध पर, 1938 ई.), (2) प्रगतिवाद (1946 ई.), (3) साहित्य की परख (1948 ई.),  (4) कश्मीर : देश और संस्कृति (1949 ई.), (5) हिंदी गद्य साहित्य (1952 ई.),  (6) हिंदी साहित्य के 80 वर्ष (1954 ई.),  (7) साहित्यानुशीलन (1955 ई.), (8) आलोचना के मान (1958 ई.), (9) साहित्य की समस्याएँ (1958 ई.),  (9) आलोचना के सिद्धान्त (1960 ई.), (10) आधुनिक संस्कृति के निर्माता (11) बाबा पृथ्वीसिंह आज़ाद  (12) परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए (1999 ई.)। 

#हिंदी भाषा में प्रयुक्त विदेशज या विदेशी शब्द

#हिंदी भाषा में प्रयुक्त विदेशज या विदेशी शब्द


हिंदी भाषा में प्रयुक्त होने वाले विदेशी शब्दों को विदेशज या विदेशी शब्द कहते हैं। ये शब्द हिंदी में फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पश्तो, पुर्तगाली, चीनी, अंग्रेज़ी, इत्यादि से आए हैं।
आधुनिक आर्य भाषा का विकास 11 वीं शताब्दी से शुरू होता है और उसी समय से शासन-प्रशासन, धर्म-संस्कृति से संबंधित है कतिपय विदेशी शब्द हिंदी भाषा में शामिल होने शुरू हो गए और यह प्रकिया आज तक जारी है और  भविष्य में भी जारी रहेगी। आदान-प्रदान और बदलाव एक सतत् प्रक्रिया है, जिसमें पुराने शब्द अतीत के गर्भ में समाते और नए शब्द जन्म लेते रहते और घुलते-मिलते रहते हैं।
हिंदी में प्रयुक्त एशियाई शब्द
फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पश्तो, जापानी शब्द, चीनी शब्द।
हिंदी में प्रयुक्त यूरोपीय शब्द
अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, रूसी, फ्रांसीसी, डच, जर्मन, इतालवी शब्द।
विस्तार के लिए देखें—

#पाश्चात्य प्रमुख काव्य सिद्धांत

#पाश्चात्य प्रमुख काव्य सिद्धांत

प्लेटो : अनुकरण सिद्धांत, दैवीय (ईश्वरीय) प्रेरणा सिद्धांत।
अरस्तू : अनुकरण सिद्धांत, विरेचन सिद्धांत त्रासदी।
लोंजाइनस : औदात्य या उदात्त सिद्धांत।
रिचर्डस : मूल्य सिद्धांत, सम्प्रेषण सिद्धांत, काव्य भाषा सिद्धांत।
टी. एस. इलियट : वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धान्त, निर्वैयक्तिकता का सिद्धान्त, परम्परा की परिकल्पना का सिद्धान्त।
क्रोचे : अभिव्यंजनावद।
विलियम वर्डसवर्थ : काव्यभाषा सिद्धांत, स्वच्छंदतावाद।
कॉलरिज : कल्पना सिद्धांत, फैंटेसी सिद्धान्त।
हीगेल : द्वन्द्ववाद।
कार्ल मार्क्स : द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, मार्क्सवादी यथार्थवाद।
जार्ज लुकाच : महान यथार्थवाद।
कुर्वे एवं  फ्लावेयर : यथार्थवाद।
एमीली जोला : प्राकृत यथार्थवाद।
क्लींथ ब्रुक्स : विडम्बना और विसंगति, अंतर्विरोध।
एलन टेट : तनाव।
जाक देरिदा : विखंडनवाद, उत्तर संरचनावाद।
विलियम एम्पसन : एम्बीगुइटी, अनेकार्थता।
वी. के. विम्साट : सार्वभौमिक मूर्तविधान।
नार्थप फ्राई : मिथकीय समीक्षा।
लारेंस : अंतश्चेतनावादी यथार्थवाद।
फ्रायड : इडियन यथार्थवाद/मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद।
फ्लावर्ट : कुत्सित यथार्थवाद।
डेकार्ट और लॉक : दार्शनिक यथार्थवाद। रॉबर्ट पेन वारेन : आइरनी।
होरेस : औचित्य सिद्धांत।


गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

अंधेर नगरी' के दृश्य क्रमानुसार

अंधेर नगरी' के दृश्य क्रमानुसार

https://www.hindisahityavimarsh.com/

'अंधेर नगरी' का अंतिम दृश्य है :
(1) अरण्य (2) जंगल (3) बाज़ार (4) श्मशान
Question Type :           MCQ
Question ID :  61547512408
Option 1 ID :  61547548377
Option 2 ID :  61547548378
Option 3 ID :  61547548379
Option 4 ID :  61547548380
Status :            Answered
Chosen Option :          3 (120   Hindi      61547512408      61547548380     


'अंधेर नगरी' के दृश्य क्रमानुसार : समर्पण, प्रथम दृश्य (वाह्य प्रांत), दूसरा दृश्य (बाज़ार), तीसरा दृश्य (जंगल), चौथा दृश्य (राजसभा) पांचवा दृश्य (अरण्य), छठा दृश्य (श्मशान)।