बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

शमशेर बहादुर सिंह प्रगतिशील त्रयी के कवि౼1

(जन्म : देहरादून, मृत्यु : अहमदाबाद)

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अवैतनिक सम्पादक : मुहम्मद इलियास हुसैन

सहायक सम्पादक : शाहिद इलियास

आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभ हैं౼ शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन और  त्रिलोचन शास्त्री।
हिंदी कविता में अनूठे माँसल ऐंद्रीकशमशेर बहादुर सिंह प्रगतिशील त्रयी के कवि౼1 बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। दूसरे  सप्तक (1951) से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।
शमशेर स्वयं पर इलियट-एजरा पाउंड-उर्दू दरबारी कविता का रुग्ण प्रभाव होना स्वीकार करते हैं। लेकिन उनका स्वस्थ सौंदर्यबोध इस प्रभाव से ग्रस्त नहीं है।
शमशेर एक तरफ 'यौवन की उमड़ती यमुनाएं' अनुभव कर सकते थे, दूसरी तरफ 'लहू भरे गवालियर के बाजार में जुलूस' भी देख सकते थे।
प्रमुख रचनाएँ
  • कविता-संग्रह : अमन का राग (1952), एक पीली शाम (1953), एक नीला दरिया बरस रहा, कुछ कविताएं (1956), कुछ और कविताएं (1961), चुका भी नहीं हूं मैं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता - अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988), सुकून की तलाश।
  • निबन्ध-संग्रह : दोआब
  • कहानी-संग्रह : प्लाट का मोर्चा
·         संपादन : 'रूपाभ', इलाहाबाद में कार्यालय सहायक (1939), 'कहानी' में त्रिलोचन के साथ (1940), 'नया साहित्य', बंबई में कम्यून में रहते हुए (1946) माया में सहायक संपादक (1948-54), नया पथ और मनोहर कहानियाँ में संपादन सहयोग। दिल्ली विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान की एक महत्वपूर्ण परियोजना 'उर्दू हिन्दी कोश' का संपादन (1965-77), प्रेमचंद सृजनपीठ, विक्रम विश्वविद्यालय के अध्यक्ष (1981-85)।
पुरस्कार व सम्मान
·         साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977 ई.) 'चुका भी हूँ नहीं मैं' के लिये
कुछ विचार
शमशेर ने संवेदनाओं के गुणचित्र उपस्थित करने के क्षेत्र में जो महान सफलताएँ प्राप्त की हैं, वे उस क्षेत्र में अन्यत्र दुर्लभ हैं। ౼गजानन माधव मुक्तिबोध
हम चाहें तो उन्हें रूमानी और बिंबवादी कवि भी कह सकते हैं। अभी तक और कभी इसके बाहर वह नहीं गए। ...सहजता अगर मनुष्य का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह का जीवन और काव्य उसका उदाहरण है। ...वे सौंदर्य के अनूठे चित्रों के स्त्रष्टा के रूप में हिंदी में सर्वमान्य हैं। ౼अज्ञेय
शमशेर उन कवियों में थे, जिनके लिए मा‌र्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था। ౼डॉ. अजय तिवारी
काव्य-पंक्तियाँ
1. मोटी धुली लॉन की दूब,
साफ मखमल-सी कालीन।
ठंडी धुली सुनहली धूप।
2. बादलों के मौन गेरू-पंख, संन्यासी, खुले है/ श्याम पथ पर/ स्थिर हुए-से, चल।
3. 'टूटी हुई, बिखरी हुई' प्रतिनिधि कविताएँ नहीं मानी जाती। उनमें शमशेर ने लिखा है-
'दोपहर बाद की धूप-छांह
में खड़ी इंतजार की ठेलेगाड़ियां/ जैसे मेरी पसलियां../
खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे है।.
जो/ मेरी आंखों का सूनापन है।'
4. उषा शीर्षक कविता में उन्होंने भोर के नभ को नीले शंख की तरह देखा है।
'प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे'।
5. वैदिक कवियों की तरह वे प्रकृति की लीला को पूरी तन्मयता से अपनाते है-
जागरण की चेतना से मैं नहा उट्ठा।
सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता।
6.  सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता
केश-तन में झिलमिला कर डूब जाता..
7. उन्होंने स्वयं को 'हिंदी और उर्दू का दोआब' कहा है। रूढिवाद-जातिवाद का उपहास करते हुए वे कहते हैं-
'क्या गुरुजी मनु ऽ जी को ले आयेंगे?
हो गये जिनको लाखों जनम गुम हुए।'
8, मुझे बादशाहत नहीं चाहिए
मगर तू ही कुल मेरी दुनिया है क्यों।
9. अपने प्रिय कवि महाकवि निराला को याद करते हुए शमशेर ने लिखा है-
भूल कर जब राह- जब-जब राह.. भटका मैं
तुम्हीं झलके हे महाकवि,
सघन तम की आंख बन मेरे लिए।


बुधवार, 4 जनवरी 2017

उषा प्रियंवदा की रचनाएँ

उषा प्रियंवदा की रचनाएँ

(24 दिसंबर, 1931)



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कहानी-संग्रह
  • प्रसिद्ध कहानी : वापसी (1950)
  • 'जिंदगी और गुलाब के फूल' (1961)
  • फिर वसन्त आया (1961)
  • 'एक कोई दूसरा' (1966)
  • कितना बड़ा झूठ (1972)
  • 'मेरी प्रिय कहानियां'
उपन्यास
  • 'पचपन खंभे, लाल दीवारें' (1961)
  • 'रुकोगी नहीं राधिका' (1967)
  • शेषयात्रा (1984) 
  • अंतर्वंशी (2000) 
  • भया कबीर उदास (2007) 
  • नदी (2013)

सम्मान और पुरस्कार

2007 में केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित।


 

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

मन्नू भंडारी की रचनाएँ

जन्म : 3 अप्रैल 1931 को मध्य प्रदेश के भानपुरा नगर में।

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कहानी-संग्रह
#मैंहा र गई (1957)
#एक प्लेट सैलाब (1962)
#यही सच है (1966) 
#तीन निगाहों की एक तस्वीर' (1968) 
#त्रिशंकु (1978)
#आंखों देखा झूठ
#नायक खलनायक विदूषक
#रानी माँ का चबूतरा 
उपन्यास
  • आपका बंटी  (1971)
  • महाभोज (1979) 
  • स्वामी
  • एक इंच मुस्कान (1962)
  • कलवा

नाटक
  • बिना दीवारों का घर (1966)
फ़िल्म पटकथाएँ
  • रजनीगंधा
  • निर्मला
  • स्वामी
  • दर्पण।
  • महाभोज का नाट्य रूपान्तरण (1983)
आत्मकथा
  • कहानी यह भी (2007)
प्रौढ़ शिक्षा के लिए


गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

कृष्णा सोबती की रचनाएँ

कृष्णा सोबती की रचनाएँ 

(18 फ़रवरी, 1925)


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उपन्यास
  • 'सूरजमुखी अंधेरे के' (1972)
  • 'ज़िन्दगीनामा' (1979)
  • 'दिलो-दानिश' (1993)
  • 'समय सरगम' (2000)
कहानी-संग्रह
  • पहली कहानी 'लामा' (1950)
  • 'बादलों के घेरे'
  • 'डार से बिछुड़ी''
  • यारों के यार'
  • 'तीन पहाड़'
  • 'मित्रो मरजानी'
  • सिक्का बदल गया

‘सिक्का बदल गया’ (भारत-पाक विभाजन पर), ‘बदली बरस गई’ जैसी कहानियाँ भी तेज़ी-तुर्शी में पीछे नहीं। डॉ. रामप्रसाद मिश्र ने कृष्णा सोबती की चर्चा करते हुए दो टूक शब्दों में लिखा है: उनके ‘ज़िन्दगीनामा’ जैसे उपन्यास और ‘मित्रो मरजानी’ जैसे कहानी संग्रहों में मांसलता को भारी उभार दिया गया है...केशव प्रसाद मिश्र जैसे आधे-अधूरे सैक्सी कहानीकार भी कोसों पीछे छूट गए। बात यह है कि साधारण शरीर की ‘अकेली’ कृष्णा सोबती हों या नाम निहाल दुकेली, मन्नु-भण्डारी या प्राय: वैसे ही कमलेश्वर...अपने से अपने कृतित्व को बचा नहीं पाए...कृष्णा सोबती की जीवनगत यौनकुंठा उनके पात्रों पर छाई रहती है।

पुरस्कार-सम्मान

1980             'साहित्य अकादमी पुरस्कार' ('ज़िन्दगीनामा पर)
1981           'शिरोमणी पुरस्कार'
1982           'हिन्दी अकादमी अवार्ड'
1996           'साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप'
1999           'कछा चुडामणी सम्मान'
इसके अतिरिक्त इन्हें 'मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार' भी प्राप्त हो चुका हैं।

दीप्ति खण्डेलवाल (1930)

कहानी-संग्रह

  • कड़वे सच (1975)
  • धूप के अहसास (1976)
  • वह तीसरा (1976)
  • सलीब पर (1977)
  • दो पल की छाँव (1978)
  • नारी मन (1979)
  • औरत और बातें (1980)

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाएँ

       (1904-1948)

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कविता-संग्रह
  •  मुकुल़
  • त्रिधारा
कहानी-संग्रह
  • बिखरे मोती (1932, भग्नावशेष, होली, पापीपेट, मंझलीरानी, परिवर्तन, दृष्टिकोण, कदम के फूल, किस्मत, मछुये की बेटी, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, अनुरोध, व ग्रामीणा कुल 15 कहानियां)
  • उन्मादिनी (1934, उन्मादिनी, असमंजस, अभियुक्त, सोने की कंठी, नारी हृदय, पवित्र ईर्ष्या, अंगूठी की खोज, चढ़ा दिमाग, व वेश्या की लड़की कुल 9 कहानियां)
  • सीधे साधे चित्र (1947, इसमें कुल 14 कहानियां) सुभद्रा कुमारी चौहान ने कुल 46 कहानियां लिखी!,
जीवनी
  • 'मिला तेज से तेज' (1970, सुधा चौहान)
डायरी
  • बन्दिनी की डायरी (सुधा चौहान)।

महादेवी वर्मा (1907 –1987)

काव्य
गद्य
विविध संकलन
  • स्मारिका
  • स्मृति चित्र
  • संभाषण
  • संचयन
  • दृष्टिबोध
पुनर्मुद्रित संकलन
निबंध

 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

हिंदी के संत कवि

हिंदी के संत कवि


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Mobile : 9717324769
अवैतनिक सम्पादक : मुहम्मद इलियास हुसैन
सहायक सम्पादक : शाहिद इलियास

1398-1518 कबीर  बीजक
1398-1448 रैदास  रविदास की वाणी
1469-1538 गुरुनानक  जपूजी, असादीवार, रहिदास, सोहिला
1455-1543  हरिदास निरंजनी अष्टपदी, जोगग्रंथ, हंसप्रबोध ग्रंथ
1554-1603 दादूदयाल हरडेवाणी अंगवधू
1574-1682  मलूकदास ज्ञानबोध, रतनखान भक्ति विवेक भक्तवच्छावली, राम अवतार लीला ब्रज लीला, ध्रुवचरित, सुखसागर
1596-1689  सुन्दरदास ज्ञानसमुद्र, सुन्दर विलास
1540-1648 लालदास
1590-1655 बाबा लाल
15671689  संत रज्जब सब्बंगी, रज्जब वाणी 14472-1552
1563-1606 गुरु अर्जुन देव सुखमनी, बावन, अक्षरी
1472-1552  शेख फरीद

अष्टछाप के कवि कालक्रमानुसार

अष्टछाप के कवि कालक्रमानुसार

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अवैतनिक सम्पादक : मुहम्मद इलियास हुसैन

सहायक सम्पादक : शाहिद इलियास

स्मरण-सूत्र  :  कु सू प कृ गो छी च न
1525    कुम्भनदास
1535    सूरदास
1550    परमानंद दास
1553    कृष्णदास
1562    गोविंदस्वामी
1572    छीतस्वामी
1587    चतुर्भुजदास
1590    नंददास

कुम्भनदास (1525)


जन्म सन् 1468 ई. में, सम्प्रदाय प्रवेश सन् 1492 ई. में और गोलोकवास सन् 1582 ई. के लगभग हुआ था।

1468-1583 कुम्भनदास भक्तन को कहा सीकरी सों काम।
आवत जात पनहिया टूटी बिसरि गयो हरि नाम।
जाको मुख देखे दुख लागे ताको करन करी परनाम।
कुम्भनदास लाला गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।



अष्टछाप के कवियों में सबसे पहले कुम्भनदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग में दीक्षा ली थी। इन्हें मधुरभाव की भक्ति प्रिय थी और इनके रचे हुए लगभग 500 पद उपलब्ध हैं।

परिचय

राजा मानसिंह ने इन्हें एक बार सोने की आरसी और एक हज़ार मोहरों की थैली भेंट करनी चाही थी परन्तु कुम्भनदास ने उसे अस्वीकार कर दिया था।
प्रसिद्ध है कि एक बार अकबर ने इन्हें फ़तेहपुर सीकरी बुलाया था। सम्राट की भेजी हुई सवारी पर न जाकर ये पैदल ही गये और जब सम्राट ने इनका कुछ गायन सुनने की इच्छा प्रकट की तो इन्होंने गाया :
भक्तन को कहा सीकरी सों काम।
आवत जात पनहिया टूटी बिसरि गयो हरि नाम।
जाको मुख देखे दुख लागे ताको करन करी परनाम।
कुम्भनदास लाला गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।
कुंभनदास के सात पुत्र थे। परन्तु गोस्वामी विट्ठलनाथ के पूछने पर उन्होंने कहा था कि वास्तव में उनके डेढ़ ही पुत्र हैं क्योंकि पाँच लोकासक्त हैं, एक चतुर्भुजदास भक्त हैं और आधे कृष्णदास हैं, क्योंकि वे भी गोवर्धन नाथ जी की गायों की सेवा करते हैं। कृष्णदास को जब गायें चराते हुए सिंह ने मार डाला। श्रीनाथजी का वियोग सहन न कर सकने के कारण ही कुम्भनदास गोस्वामी विट्ठलनाथ के साथ द्वारका नहीं गये थे और रास्ते से लौट आये थे।

मधुर-भाव की भक्ति

कुम्भनदास को निकुंजलीला का रस अर्थात् मधुर-भाव की भक्ति प्रिय थी और इन्होंने महाप्रभु से इसी भक्ति का वरदान माँगा था। कुम्भनदास ने गाया था-
रसिकिनि रस में रहत गड़ी।
कनक बेलि वृषभान नन्दिनी स्याम तमाल चढ़ी।।
विहरत श्री गोवर्धन धर रति रस केलि बढ़ी ।।

रचनायें

  • कुम्भनदास के पदों की कुल संख्या, जो 'राग-कल्पद्रुम' 'राग-रत्नाकर' तथा सम्प्रदाय के कीर्तन-संग्रहों में मिलते हैं, 500 के लगभग हैं।
  • कुम्भनदास के पदों का एक संग्रह 'कुम्भनदास' शीर्षक से श्रीविद्या विभाग, कांकरोली द्वारा प्रकाशित हुआ है।
  1. अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय : डा. दीनदयाल गुप्त
  2. अष्टछाप परिचय : श्रीप्रभुदयाल मीत्तल।